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श्री चित्रगुप्त महाराज की जय
ganesh laxhmi puja
चित्रगुप्त महात्म्य :-

चित्रगुप्त जी हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार वह देवता है, जिनका मुख्य काम संसार के सभी मनुष्यों के अच्छे –बुरे कर्मों का लेखा जोखा रखना है । भगवान चित्रगुप्त जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त जीवों के सभी कर्मों को अपनी पुस्तक में लिखते रहते हैं और जब जीवात्मा मृत्यु के पश्चात यमराज के समक्ष पहुँचता है तो उनके कर्मों को एक-एक कर सुनाते हैं और उन्हें अपने कर्मों के आधार पर मृत्यु के बाद उन्हें स्वर्ग अथवा नरक में स्थान प्राप्त होता है।

भगवान चित्रगुप्त सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के अंश से उत्पन्न हुए हैं । सृष्टि की रचना के क्रम में ब्रह्मा जी ने देव-असुर, गंधर्व, अप्सरा, स्त्री-पुरूष पशु-पक्षी को जन्म दिया, और धर्मानुसार जीवों को सजा देने का कार्य करने के लिये धर्मराज यमराज का जन्म हुआ। धीरे- धीरे संसार की आबादी बढ़ने लगी और जीवों को कर्म के अनुसार पुरस्कार अथवा दण्ड देने के क्रम में यमराज को कठिनाई होने लगी। तब धर्मराज यमराज ने ब्रह्मा जी से एक योग्य सहयोगी की मांग की। तब ब्रह्मा जी ब्रह्मा जी ध्यानलीन हो गये और एक हजार वर्ष की तपस्या के बाद उनके (ब्रह्मा जी के) काया से एक पुरूष उत्पन्न हुआ; चूंकि इस पुरूष का जन्म ब्रह्मा जी की काया से हुआ अत: ये कायस्थ कहलाये और इनका नाम चित्रगुप्त पड़ा. ( चूंकि जब चित्रगुप्त जी का प्रादुर्भाव हुआ, उस समय ब्रह्मा जी भगवान विष्णु का ध्यान, अपने चित्त में गुप्त रख कर रहे थे, और तपस्या काल में हीं उस उत्तम पुरुष का जन्म हुआ अत: वे चित्रगुप्त कहलाए।

ब्रह्मा जी ने कहा कि हे उत्तम पुरूष आप चारों वेद, छहों, अठारह पुराणों के ज्ञाता हैं, आप प्रभु , शिवजी एवं दुर्गाजी की आराधना कीजिये और वर्णो के कर्मो का हिसाब रखिए।

ब्रह्मा जी से आज्ञा पाकर चित्रगुप्त जी कुटनगर पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने मां दुर्गा जी की उपासना की । दुर्गा जी ने श्री चित्रगुप्त जी को उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें लेखन कला की जानकारी दी। लेखन कला की जानकारी प्राप्त करने के पश्चात़ श्री चित्रगुप्त जी अवन्तिकापुर गये जहां उन्होनें शिवजी की आराधना की तथा वहीं रहकर उन्होंने विधान तैयार किया जिसे सभी देवताओं तथा ऋषियों ने अंगीकृत किया। पुलिस्त्य मुनि श्रेष्ठ कायस्थ वर्ण उत्पत्ति का वृतांत सुनाते हुये बताते है कि एक समय सूर्य नारायण अपनी पत्नी तथा सुशर्मा ऋषि की पुत्री शोभावती के साथ अवन्तिकापुर पहुंचे जहां उन्होंने चित्रगुप्त जी को भगवान शिवजी की अराधना में ध्यान मग्न देखा। शोभावती चित्रगुप्त जी पर मोहित हो गयी। सूर्यदेव तथा उनकी पत्नी शोभावती की इच्छा शक्ति को भांप गये तब उन्होनें शोभावती को समझाया कि वह पार्वती का पूजन करें तभी उनको मन वांछित फल प्राप्त होगा।



एक समय की बात है शिवजी अपनी अर्धांगिनी पार्वती के साथ विचरण करते हुये सूर्यलोक पहुंचे जहां उन्होंने अत्यंत सुशील, रूपवती , गुणवती, कन्या को देखकर सूर्यदेव से सारा वृतांत कह सुनाया। भगवान शिव ने कहा के इस कन्या के लिये चित्रगुप्त जी से अधिक उत्तम और कोई वर नहीं होगा, वहीं शोभावती (इरावती) के लिये श्रेष्ठ वर है। शिवजी सूर्यदेव को साथ लेकर सुशर्मा ऋषि के पास गये तथा उन्हें सारा वृतांत बताया , यह सुनकर सुशर्मा ऋषि अत्यंत प्रसन्न हुये तथा सुशर्मा ऋषि , सूर्यदेव , ब़हमाजी तथा समस्त देवताओं तथा अठासी हजार ऋषियों को लेकर चित्रगुप्त जी के पास गये तथा चित्रगुप्तजी का विवाह शोभावती (इरावती) के साथ कराया। चित्रगुप्त जी के विवाह के अवसर पर सूर्यदेव की पौत्री नन्दिनी (सुदक्षिणा) भी उपस्थित थी जो मन ही मन इस विवाह को देखकर सोच रही थी कि काश मेरा विवाह भी चित्रगुप्त जी से हो जाता तो कितना अच्छा होता । भगवान शिवजी एवं ब्रहाजी नन्दिनी की इच्छा शक्ति को भांप गये तथा यह बात उन्होंने सूर्य नारायण को बताई कि उन्हे अपनी पौत्री नन्दिनी का विवाह भी चित्रगुप्त जी के साथ कर देना चाहिये, तब मनु की पुत्री नन्दिनी का विवाह भी सभी देवताओं एवं ऋषियों की उपस्थिति में श्री चित्रगुप्त जी के साथ हो गया।



श्री चित्रगुप्त जी की पत्नी नन्दिनी ( सुदक्षिणा ) से चार पुत्र क्रमश: 1.धर्मध्वज ( श्रीवास्तव )2. रामदयाल (सक्सेना)3. योगाधर(माथुर)4. भानुप्रकाश (भटनागर) हुये। शोभावती (इरावती) से आठ पुत्र क्रमश: 1. श्याम सुन्दर (सुरज ध्वज)2. सुमति (निगम)3. सदानन्द (कुलश्रेष्ठ)4. दामोदर (कर्ण)5. धर्मदत्त (गौण)6. दीनदयाल (अष्ठाना)7. शार्ड् गधर ( अम्बष्ठ) एवं8. राधौराम ( बाल्मीकि) हुये।

चित्रगुप्त भगवान का जन्म यम द्वितीय को हुआ था और उनके जन्मदिन के रूप में कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को चित्रगुप्त पूजा मनाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि जो मनुष्य इस चित्रगुप्त भगवान की पूजा करेगा वह वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करेगा।